With You; Without You – review

With You; Without You – review

“काश वे दिन कभी खत्म ही नहीं होते, सब कुछ हमेशा वैसे ही चलते रहता, पर शायद ऊपरवाले भी सब कुछ अच्छा -अच्छा देखते-देखते बोर होने लगते हैं। पर मैं बेकार ही ऊपरवाले को दोष दे रहा हूँ, सब कुछ तो मेरा ही किया हुआ है। उन खुशनुमा लम्हों को कड़वाहट से तो मैंने ही भर दिया , उन गहरे आत्मीय रिश्तों को मैंने ही तहस-नहस कर दिया । आखिर क्यों? क्यों किया मैंने वैसा? यदि मैं तब वैसा कुछ नहीं करता तो शायद आज तीनों के जीवन की दिशा और दशा कुछ और ही होती। सब कुछ अभी से अलग होता , अच्छा -अच्छा होता ।”

बस निशिन्द की यही बातें इस उपन्यास की विसाद हैं! विद यू; विदाउट यू की कहानी तीन दोस्तों की जिंदगी के आस-पास घूमती है और ये तीन दोस्त हैं निशिन्द, आदित्य और रमी।  बचपन से साथ रहे ये तीन मित्र जब जवानी की दहलीज पर कदम रखते हैं इनकी ज़िंदगी में मानो कोई भूचाल सा आ जाता है और एक गलती निशिन्द की सबकी दोस्ती तो तोड़ कर रख देती है।  सब अलग अलग हो जाते हैं और जीवन मनो रुक सा जाता हो उन लोगों के लिए।

ये उपन्यास कहीं न कहीं लोगों के दिलों को जरूर छू जायेगा क्यूंकि हम सब इस अवस्था से जरूर गुजरते हैं जब हम पहले पहले बार प्यार को महसूस करते हैं।  बेसब्री सी होती है मन में ये जानने के लिए की सामने वाला हमसे प्यार करता भी है या नहीं और अगर करता है तो कहता क्यों नहीं और अगर नहीं करता तो क्यों नहीं करता …. आदित्य और रमी भी इसी उहापोह में थे पर शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था! निशिन्द ने अपनी भावनाओं की खातिर दो प्यार करने वालों को दूर कर दिया और खुद भी इस भंवर में फंसा रहा।

जब रमी फिरसे रश्मि देसाई बांके निशिन्द और आदित्य की जिंदगी में आती है तो मनो पुरे उपन्यास की कल्पना ही बदल जाती हो।  अब रमी वो मासूम और सीधी सधी रमी नहीं है! वो भी वक्त के साथ चलना सिख चुकी है और खुद को इस काबिल बना लिया है की आने वाले वक्त का मुकाबला कर सके।  अब बदली हुई रमी मन ही मन में निशिन्द को चाहती है पर निशिन्द को जाने क्यों लगता है की अगर ओर रश्मि को आदित्य से मिला दे तो शायद उसके पाप का प्रायश्चित हो जायेगा और इसी उलझन में कहानी बढ़ती है।  प्रभात रंजन ने कहानी को इस तरीके से बयां किया है की मानो यह एकदम से जिवंत हो उठी हो और हमसे खुद बातें हो…

क्या प्यार बस देह से होता है? क्या प्यार बस दो जिस्मों के बीच का बंधन है? कुछ ऐसे ही अहम सवाल प्रभात रंजन ने अपनी नॉवेल में उठाये हैं जो की बड़े ही अच्छे ढंग से प्रस्तुत किये हैं काल्पनिक कहानी के माध्यम से। और कहानी का अंत तो मानो बस दिलों को छू ही जाता हो! आप जरूर विद यू; विदाउट यू उपन्यास को पसंद करेंगे ये मेरा यकीं है क्यूंकि मैं बस वही कहानियां पढ़ती हूँ जो मुझे बांधके रख सकें! और इस किताब में वो बात है! अगर आप भी ये किताब खरीदना चाहते हैं तो कृपया निचे दिए लिंक पे जाएँ और पुस्तके के बारे में लेखक  पे पढ़ें एवं वहां से खरीदें भी।

With You; Without You by Prabhat Ranjan

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